सीएफ़एल (CFL) बल्ब और ट्यूब – सोच कर लगाएँ और खतरों से रहें सावधान

-ज्ञान प्रकाश सोनी
CFL type 2बिजली की कमी और इसकी बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए बिजली की बचत के लिये  सीएफ़एल बल्ब और ट्यूब लगाना समय की आवश्यकता है इसलिये इन्हें लगाएं ज़रूर पर इसके साथ ही इसके ख़तरों से जागरूक रहते हुए अपने स्वयं के और अपने परिजनों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना न भूलें। बिजली बचत करने वाले इन सीएफ़एल बल्बों के परिचय, उपयोगिता, संभावित कुप्रभावों व दुर्घटनाओं से संबंधित विश्वस्नीय जानकारी और इंगलैंड के पर्यावरण, आहार और ग्रामीण विभाग ने इनको काम में लेते समय वांछित सावधानियों का जो चेतावनी पत्र जारी किया है, उन पर आधारित पूरा लेख आगे पढ़िये।
1. प्रस्तावना –
पिछले कुछ वर्षों से हमें यह बताया जा रहा है कि सीएफ़एल बल्ब और ट्यूब लगाने से बिजली की बचत होती है तथा इनकी उम्र भी ज़्यादा होती है। इसलिये मँहगा होते हुए भी ऐसे बल्बों का प्रचलन हमारे देश भारत में बढ़ता जा रहा है। विदेशों में यह प्रचलन काफ़ी पहले ही बढ़ चुका था और इस कारण इसके कुप्रभाव भी पहले वहाँ पर सामने आये हैं। विदेशों में तो ऐसे बल्बों के ख़राब होने के बाद सुरक्षित पुनर्चक्रण की पुख़्ता व्यवस्था है लेकिन हमारे देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण हमारे यहाँ कुप्रभावों की संभावना और भी ज्यादा है जिसे देखते हुए हमें सजग रहने की आवश्यकता है।
2. सीएफ़एल का अर्थ –
सीएफ़एल अंग्रेज़ी संक्षिप्ति CFL (Compact Fluorescent Light/Lamp) का हिंदी प्रतिरूप है। हम अगर इसको हिंदी नाम देना जाहें तो वह शब्दकोशीय आधार पर “संहत प्रतिदीप्त दीप” होगा और इसकी संक्षिप्ति “संप्रदी” कर सकते हैं। लेकिन अभी प्रचलन अधिकाधिक अंग्रेज़ी शब्दों को अपनाने का है सो इस लेख में सीएफ़एल शब्द का ही उपयोग किया गया है।
3. सीएफ़एल का आविष्कार व इतिहास –
आज के सीएफ़एल बल्बों की मूल तकनीक का आविष्कार अमेरिकी इलेक्टिकल इंजीनियर पीटर कूपर हैविट (Peter Cooper Hewitt) ने सन् 1890 में कर पेटेंट ले लिया था लेकिन तब इस तकनीक पर आधारित बल्बों का उपयोग केवल फोटो स्टूडियो और उद्योगों में ही विशेष आवश्यकता के लिये होता था क्योंकि ये बहुत मँहगे थे। ऊर्जा की समस्या को देखते हुए ऐसे बल्बों के घरेलू उपयोग के लिये कुछ सुधार अमेरिका स्थित जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी में कार्यरत इंजीनियर एडवर्ड हैमर (Edward Hammer) नाम के इंजीनियर ने 1976 में किये लेकिन इसके व्यापारिक उत्पादन करने के लिये लगाये जाने वाले कारखाने उस समय की अनुमानित लागत (2.5 करोड़ डॉलर) को देखते हुए कंपनी ने यह काम हाथ में नहीं लिया। नीदरलैंड की फिलिप्स कंपनी ने 1980 में और जर्मनी की ऑसराम कंपनी ने 1985 में सीएफ़एल बल्बों को बाज़ार में उतारा। इसके बाल चीन ने 1995 से वृहद स्तर पर सस्ते सीएफ़एल बल्ब बनाने शुरू किये और तबसे इनका प्रचलन बढ़ता ही जा रहा है।
4. सीएफ़एल की तकनीक –
सीएफ़एल के दो मुख्य भाग होते हैं – इलेक्ट्रोनिक बेलास्ट और गैस भरी ट्यूब। बेलास्ट में एक रेक्टिफ़ायर वाला सर्किट बोर्ड, एक फ़िल्टर केपेसिटर और दो स्विचिंग ट्रांज़िस्टर होते हैं। गैस भरी ट्यूब में फ़ॉस्फ़ोर का मिश्रण होता है जो बेलास्ट से मिलने वाली उच्च आवृति की बिजली से चमक कर प्रकाश देते हैं। फ़ॉस्फ़ोरों की डिजाइन के आधार पर सीएफ़एल सफ़ेद, पीले या अन्य रंग का प्रकाश देते हैं। फ़ॉस्फ़ोर रेयर अर्थ कम्पाउंड (rare earth compounds) हैं। इनका उपयोग सीएफ़एल के अलावा रेडार, केथोड रे ट्यूब व प्लाज़्मा डिस्प्ले स्क्रीन, नियोन साइन, आदि में होता है।
5. सीएफ़एल बनाने के मुख्य कच्चे माल की उपलब्धता –
सन् 1948 तक रेयर अर्थ कम्पाउंड के उत्पादन में भारत और ब्राज़ील का एकाधिकार था, फिर 1980 तक अमेरिका इसके उत्पादन में अग्रणी रहा और वर्तमान में विश्व की कुल 40000 टन माँग की 95% आपूर्ति चीन कर रहा है और एक तरह से पूरे विश्व में रेयर अर्थ के उत्पादन व इसकी कीमतों पर इस देश का एकाधिकार है।rare earth production जापान ने इस एकाधिकार को कम करने के लिये ख़राब बल्बों, टी वी व कम्प्यूटर स्क्रीनों का पुनर्चक्रण कर रेयर अर्थ निकालने की तकनीक हाल ही में विकसित की है क्योंकि चीन ने कुछ राजनीतिक कारणों से जापान को रेयर अर्थ के निर्यात पर कुछ समय के लिये प्रतिबंध लगा दिया था।
6. सीएफ़एल के मुख्य प्रकार
सीएफ़एल आधारित उपकरण मुख्यतः दो प्रकार के आते हैं – एक का आकार ऐसा होता है कि वे पूर्व प्रचलित Cfl bulbsबल्ब होल्डर में ही लग जाते हैं जिसे सीएफ़एल बल्ब कहते हैं और दूसरे प्रकार में इसका आकार दोहरी पतली ट्यूब का होता है जिसे एक विशेष होल्डर में फ़िट करना होता है और बेलास्ट बल्ब के साथ न होकर होल्डर के पास अलग से लगी होती है। इन्हें सीएफ़एल ट्यूब कहते हैं। पहCFL type non integratedले प्रकार में बेलास्ट बल्ब के साथ ही जुड़ी होती है और इस कारण आकार में छोटी होती है व बल्ब खराब होने के साथ ही अनुपयोगी हो जाती है चाहे यह ख़राब न भी हुई हो। दूसरे प्रकार में यदि ट्यूब ख़राब हो तो केवल ट्यूब बदली जाcfl ballastती है और बेलास्ट ख़राब हो तो केवल बेलास्ट बदली जाती है। बेलास्ट अलग होने के कारण इसके आकार की सीमा नहीं होती और इस कारण ये सामान्यतः अधिक टिकाऊ बनाई जाती हैं। अलग बेलास्ट वाली ट्यूब लाइट के फ़िक्स्चर्स के कई आकर्षक मॉडल आते हैं जो दीवार पर, छत पर या छत से लटका कर लगाए जा सकते हैं।
7. परम्परागत बल्ब – परम्परागत रूप से जो बल्ब हम काम लेते रहे हैं वे तकनीकि रूप से इन्कॅन्डेंसैन्ट लैंप (incandescent lamp) हैं जिन्हें शब्दकोशीय आधार पर हिंदी में “उद्दीप्त दीप” कहा जा सकता है। इनमें एक धात्विक फ़िलामेंट होता है जो गर्म होने पर प्रकाश देता है। इस फ़िलामेंट का ऑक्सीडेशन न हो इसलिये इसे काँच के गोले में रखा जाता है और इस गोले से या तो हवा निकाल दी जाती है या इसमें नाइट्रोजन भर दी जाती है। इस तकनीक का आविष्कार सन् 1878 में ब्रिटिश भौतिकशास्त्री जॉसेफ़ स्वान ने कर ब्रिटिश पेटेंट लिया लेकिन इसी वर्ष अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन ने अमेरिकी पेटेंट हासिल कर व्यावसायिक उत्पादन शुरू कर दिया। इसलिये एडिसन को ही परम्परागत बल्बों का जनक माना जाता है।
8. परम्परागत बल्ब बनाम सीएफ़एल –
परम्परागत बल्बों का निर्धारित जीवनकाल लगभग 750 से 1000 घंटे का होता है जबकि सीएफ़एल बल्बों व ट्यूबों का 6000 से 15000 घंटे और साथ ही समान प्रकाश देने के लिये परम्परागत बल्बों की तुलना में सीएफ़एल बिजली की लगभग एक तिहाई खपत ही करते हैं। विकिपीडिया पर उपलब्ध विवरण के अनुसार सन् 2010 में लगभग 50-70% बाज़ार परम्परागत बल्बों का था और अगर इसे शून्य कर पूरे विश्व में केवल सीएफ़एल ही काम में ली जावे तो 409 टैरावॉटऑवर्स {1 टैरावॉटऑवर (TWh) =109किलोवॉटऑवर (KWh)} बिजली की बचत होने का अनुमान है जो विश्व की कुल खपत का 2.5% मात्र है। इस परिस्थिति में पूरे विश्व के कार्बन उत्सर्जन में 23 करोड़ टन की कमी आने का अनुमान है जो नीदरलैंड तथा पुर्तगाल के वर्तमान कार्बन उत्सर्जन के बराबर है। तात्पर्य यह है कि सीएफ़एल लगाने के पीछे ऊर्जा व पर्यावरण संरक्षण का जो मुख्य तर्क दिया जाता है वह समग्र रूप से इसका प्रभाव देखने पर बहुत व़जनी नहीं है।
9. परम्परागत बल्बों पर प्रतिबंध –
ऊर्जा व पर्यावरण संरक्षण तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी की संभावना को देखते हुए कुछ देशों ने तो परम्परागत बल्बों का उपयोग कुछ विशिष्ठ प्रयोजनों को छोड़ कर प्रतिबंधित कर दिया है, कुछ चरणबद्ध रूप से कर रहे हैं। भारत में परम्परागत बल्बों का उपयोग अभी तक प्रतिबंधित तो नहीं किया गया है पर सीएफ़एल के उपयोग को टेक्स आदि में छूट दे कर प्रोत्साहित किया जा रहा है और तमिलनाडु व कर्नाटक ने सरकारी व अर्द्धसरकारी कार्यालयों तथा निकायों में परम्परागत बल्बों का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया है। जिन देशों में इन्हें प्रतिबंधित किया गया है अथवा किया जाने वाला है वहाँ जनविरोध भी हो रहा है। ऐसे ही विरोध को देखते हुए न्यूज़िलैंड सरकार ने परम्परागत बल्बों का उपयोग पर प्रतिबंध हटा दिया है। भारत में दिल्ली स्थित सैंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने सीएफएल बल्ब व ट्यूबों का विरोध करते हुए यह माँग की है कि इनमें कम ऊर्जा की खपत की वास्तविक क्षमता होनी चाहिए साथ ही वह लंबे समय के लिए काम करें तो बेहतर होगा। इन बल्बों में पारा का कम स्तर होना चाहिए और यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इन बल्बों के खराब होने के बाद इन्हें कैसे ठिकाने लगाया जाए।
10. सीएफ़एल की कमियाँ –
सीएफ़एल की मुख्य कमियाँ निम्न प्रकार से हैं –
1) सीएफ़एल बल्बों व ट्यूबों का उपयोगी जीवनकाल बिजली की गुणवत्ता में कमी, जैसे निर्धारित वोल्टेज में कमी या आधिक्य व इसमें अचानक परिवर्तन, चालू व बंद करने की बारम्बारता (frequency of cycling on and off), कमरे के तापमान, इसे लगाने की दिशा, झटका लगने या गिरने, उत्पादकीय दोष, आदि से उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होता है और सामान्यतः मानक जीवनकाल वास्तविकता में नहीं मिल पाता है। उदाहरण के लिये अगर सीएफ़एल को पाँच मिनट तक ही जला कर बंद करने का चक्र रखा जाना है तो सीएफ़एल व परम्परागत बल्बों के जीवनकाल समान ही रहने की संभावना है। अमेरिकन स्टार रेटिंग के दिशा निर्देशों में यह उल्लेख है कि अगर किसी कमरे में लगे सीएफ़एल का उपयोग 15 मिनट से कम के लिये नहीं करना है तो ऐसी स्थिति में उसे बंद करने के बजाय जलता रखा जाना श्रेयस्कर है। (क्योंकि सीएफ़एल को चालू करने में बेलास्ट अतिरिक्त बिजली की खपत करता है और बार बार बंद करने से इसकी उम्र भी घटती है)
2) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब ज्यों ज्यों पुराने होते जाते हैं ये कम प्रकाश देने लगते हैं और जीवनकाल के अंत तक यह कमी लगभग 25% तक हो जाती है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के एक परीक्षण में कुल परीक्षित बल्बों में से 25% निर्धारित जीवनकाल का 40% जीवनकाल बीतने के बाद उन पर लिखे वॉट का प्रकाश नहीं दे सके।
3) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब परम्परागत बल्बों की तुलना में काफ़ी कम उष्मा (heat) उत्सर्जित करते हैं इसलिये गर्म प्रदेशों या गर्मी के दिनों में तो लाभप्रद हैं लेकिन ठंडे प्रदेशों या सर्दी के दिनों में भवन को गर्म करने के लिये अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये जिससे ऊर्जा की वास्तविक बचत कम हो जाती है। कनाडा के विनिपेग शहर में इस दृष्टिकोण से की गई गणना के अनुसार ऊर्जा की वास्तविक बचत 75% के स्थान पर 17% ही रह जाती है यह एक अध्ययन में सामने आया है।
4) परम्परागत बल्ब स्विच चालू करते ही पूरा प्रकाश देना शुरू कर देते हैं जबकि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब स्विच चालू करने के लगभग एक सैकंड बाद चालू होते हैं और कई मॉडल पूरा प्रकाश देने में कुछ समय लेते हैं। तापमान कम होने पर यह समय और बढ़ जाता है।
5) परम्परागत बल्ब के प्रकाश को मद्धिमक (dimmer) लगा कर आवश्यकतानुसार मद्धिम (dim) किया जा सकता है जबकि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब में मद्धिमन (dimming) संभव नहीं है।(कुछ विशेष इसी प्रयोजन के मॉडलों के अलावा)
6) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब से अल्ट्रावॉयलेट किरणें निकलती हैं जिनसे इन्फ्रारेड रिमोट कंट्रोल नियंत्रित इलेक्ट्रोनिक उपकरणों की कार्यदक्षता व रंजकयुक्त (having piments & dyes) कपड़ों व चित्रकारियों (paintings) के रंग प्रभावित हो सकते हैं। परम्परागत बल्ब के प्रकाश में ऐसी किरणें नहीं निकलती हैं।
11. सीएफ़एल का जन स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कुप्रभाव –
1) यूरोपियन कमिशन की वैज्ञानिक समिति ने सन् 2008 में यह पाया कि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों की निकटता विद्यमान चर्म रोगों को बढ़ा सकती है और आँखों के पर्दे (ratina) को हानि पहुँचा सकती है। यदि दोहरे काँच की सीएफ़एल काम में ली जाय तो यह ख़तरा नहीं रहता है। दोहरे काँच की सीएफ़एल विकसित देशों में बनने लग गई हैं लेकिन भारत में यह प्रचलन आने में समय लग सकता है।
2) हर सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब में लगभग 3-5 मिलिग्राम पारा होता है जो कम मात्रा में होने पर भी ज़हर है। सीएफ़एल के ख़राब होने पर हर कहीं फेंक देने पर यह भूमि और भूमिगत जल को प्रदूषित कर देता है जो जन स्वास्थ्य के लिये भारी ख़तरा पैदा करता है। जैविक प्रक्रिया के दौरान यह पारा मिथाइल मरकरी (methylmercury) बन जाता है जो पानी में घुलनशील है और मछलियों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है। इसका मुख्य कुप्रभाव गर्भवती स्त्रियों पर होता है और परिणाम जन्मजात विकलांगता व न्यूरोविकार के रूप में सामने आते हैं। अमेरिका की नेशनल साइंस एकेडमी के एक अनुमान के अनुसार हर साल 60,000 से अधिक ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं जिनकी विकलांगता का कारण मिथाइल मरकरी होता है। भारत में ऐसे कोई अध्ययन हुए हों ऐसी जानकारी नहीं है। विकसित देशों ने कम पारे वाले बल्ब ही उत्पादित करने के मानक निर्धारित कर दिये हैं और बल्ब बनाने व बेचने वालों के लिये इनके खराब होने के बाद वापस एकत्रित कर सुरक्षित पुनर्चक्रण अनिवार्य कर दिया है। वहाँ ऐसे बल्बों की कीमत में पुनर्चक्रण की कीमत भी शामिल की जाती है। भारत में यह प्रचलन आने में कितना समय लगेगा कोई नहीं बता सकता है।
3) ऊर्जा बचाने वाले ये सीएफएल बल्ब अगर देर रात तक जलाए जाते हैं तो इनसे स्तन कैंसर होने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है क्योंकि इससे शरीर में मेलाटोनीन नाम के हारमोन का बनना काफी हद तक प्रभावित होता है। यह निष्कर्ष इजरायल के हफीफा विश्वविद्यालय के जीवविज्ञान के प्रोफेसर अब्राहम हाइम का है जो ‘क्रोनोबॉयलॉजी इंटरनेशनल’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
4) यदि सीmercury-foot-injury-3एफ़एल बल्ब या ट्यूब घर में टूट जावे और उसका सुरक्षित निस्तारण करने की जानकारी नहीं हो तो इसके गंभीर दुश्परिणाम हो सकते हैं। ऐसी ही एक दुर्घटना में पीड़ित के पाँव की स्थिति गंभीर हो गई थी क्योंकि उसने फूटे बल्ब के काँच पर पाँव रख दिया और पारे का ज़हर सीधा फैल गया ।
सीएफ़एल बल्ब के टूट जाने पर कम से कम 15 मिनट तक उस स्थान से दूर रहना चाहिये और खुली हवा आने जाने देना चाहिये ताकि विषैली गैसें बाहर निकल जावें फिर टूटे काँच के टुकड़ों को खुले हाथ स्पर्श किये बिना इकट्ठे कर कहीं दूर उजाड़ में फेंकना चाहिये क्योंकि भारत में अभी तक इनके सुरक्षित पुनःचक्रण की व्यवस्था अधिकांशतः नहीं है।
अधिकांश विकसित देशों ने इस संबंध में सार्वजनिक दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं पर भारत में अभी इसका अभाव है।
cfl-warning-poster
12. सीएफ़एल काम में लेने के लिये कुछ सुझाव –
1) परम्परागत बल्ब के स्थान पर सीएफ़एल बल्ब या ट्यूबबाइट वहीं लगावें जहाँ इसके लगातार ज्यादा घंटो तक जलते रखने की आवश्यकता हो। जहाँ कम समय तक की ही आवश्यकता हो या बार बार चालू बंद करनी हो वहाँ सीएफ़एल बल्ब या ट्यूबबाइट नहीं लगावें। कम और ज्यादा समय का निर्धारण अपने स्तर पर अनुभव के आधार पर करें क्योंकि यह बिजली की दरों, स्थान विशेष के सामान्य तापमान, हवा के आवागमन आदि पर निर्भर करता है।
2) यथासंभव सीएफ़एल बल्ब के स्थान पर सीएफ़एल ट्यूब लगाने की नीति अपनावें चाहे इसके लिये होल्डर और फ़िटिंग बदलनी पड़े क्योंकि यह बदलाव तो एक ही बार करना होगा लेकिन इसके बाद बेलास्ट व ट्यूब में से जो भी ख़राब हो, केवल वही बदलनी पड़ेगी। ध्यान रहे कि इसमें उपभोक्ता को लाभ है लेकिन निर्माताओं व विक्रेताओं को घाटा और इसलिये आपको सीएफ़एल ट्यूब खरीदने के लिये निरुत्साहित किये जाने की संभावना पूरी है।
3) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब, केवल नामी कंपनी की ही चुनें और इसे अधिकृत विक्रेता या प्रतिष्ठत दूकान से ही खरीदें चाहे कीमत अधिक हो क्योंकि सस्ती या निम्न गुणवत्ता की सीएफ़एल की उम्र तो कम होगी ही, इसके स्वास्थ्य संबंधी कुप्रभाव गंभीर हो सकते हैं।
4) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब वाले टेबल लैंप से परहेज़ करें क्योंकि इसमें त्वचा पर निकट से प्रकाश पड़ने की संभावना रहती है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।
5) रिमोट संचालित टीवी व अन्य इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के पास सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब नहीं लगावें।
6) सोते समय सारी रात यदि हल्की लाइट रखनी है तो इसके लिये सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब के बजाय परम्परागत बल्ब ही काम में लें।
7) घर के सभी सदस्यों व मिलने वालों को सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब के ख़तरों व इनके अचानक टूट जाने पर इनके सुरक्षित निस्तारण की जानकारी दें।
8) राष्ट्रहित में यदि आप यह सोचते हैं कि चीन पर निर्भरता घटे और भारत की अर्थव्यवस्था को बल मिले तो कथित बिजली और धन की बचत को दरकिनार कर अधिकाधिक परम्परागत बल्ब काम में लेने की नीति अपनावें क्योंकि अधिकतर कंपनियाँ सीएफ़एल बल्ब चीन में बनवाती हैं (जिसका कारण यह है कि इसके लिये आवश्यक कच्चा माल वहीं उपलब्ध है व वहाँ लागत भी कम आती है) जबकि परम्परागत बल्ब भारत में ही बनते हैं।
9) निष्क्रियता छोड़ कर स्थानीय निकाय, सरकार से संबंधित विभागों और जन प्रतिनिधियों को बार बार यह लिखित व मौखिक अनुरोध करें कि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब के सुरक्षित पुनर्चक्रण के नियम बनाएं/बनवाएं और पालना करवाएं ताकि जन स्वास्थ्य व पर्यावरण को ख़तरा घटे।

यह लेख इस पटल के व्यवस्थापकों के मूल अध्ययन, चयन व संकलन का परिणाम है – कृपया बिना अनुमति व बिना संदर्भ दिये कॉपी पेस्ट कर इस परिश्रम का निरादर न करें। धन्यवाद 26.7.2012

मुख्य संदर्भ –
  1. http://en.wikipedia.org/wiki/Compact_fluorescent_lamp
  2. http://en.wikipedia.org/wiki/Phosphor
  3. http://en.wikipedia.org/wiki/Rare_earth_element
  4. http://www.greenmuze.com/blogs/guest-bloggers/1031-the-dark-side-of-cfls.html
  5. http://khabar.ibnlive.in.com/news/47494/7/1
  6. http://hindi.business-standard.com/storypage.php?autono=13926
  7. http://www.shabdkosh.com/
  8. www.livehindustan.com/…/article1-story-67-67-23
This entry was posted in घरेलू नुस्के, पर्यावरण, विविध, स्वास्थ्य and tagged , , , , , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink.

One Response to सीएफ़एल (CFL) बल्ब और ट्यूब – सोच कर लगाएँ और खतरों से रहें सावधान

  1. Nazrul haque says:

    Mr nazrul haque

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *