Environment Friendly Technology for Waste Water Treatment

– D.D.Derashri

Secretary –Paniwale –NGO.

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Water is a scarce resource. Water treatment provides usable water for domestic agricultural & industrial purposes; helps to conserve & enhance water in quality & quantity; in addition prevents degeneration of our water sources of surface & ground. Green technologies today provide impressive water quality at competitive costs without contributing to global warming. Soil Bio technology (SBT) is a new technology based on a bio-conversion process where fundamental actions of nature, namely, respiration, mineral weathering, and photosynthesis are brought about in a controlled media containing selected micro and macro-organisms. The plant is reproduction Jungle system where nature does all the purification process. Over a period of time the plant merges with local ecology and becomes part of it; hence it is one time investment. In this technology sewage is treated in an evergreen garden environment so created by the media employed. Media design is such that the life of the plant is over 75 years, older the plant it improves the quality of treated water.

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स्थानीय विकास में जन भागीदारी सुनिश्चित कैसे हो ?

स्थानीय विकास की परियोजनाएं कम से कम लागत में अपने लक्ष्य को प्राप्त करें, पूर्व निर्धारित अवधि में पूरी हों, चाहे गए परिणाम दें, दीर्घकाल तक उपयोगी रहें, संचालन सुगम हो इनके कुप्रभाव न्यूनतम हों इसके लिये इनकी परिकल्पना से लेकर इनके पूरा होने तक और बाद में इनके संचालन में जन भागीभागीदारी का महत्व किसी से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकतर मामलों में जन भागीदारी की बात, मात्र एक दिखावा, बल्कि कई बार तो एक छलावा रह जाती है और अंत में होता वही है जो कि सरकारी तंत्र के कर्ता धर्ता चाहते हैं । जन भागीदारी सुनिश्चित कैसे हो इस पर  आगे पढ़िये। Continue reading

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Say No to R.O. Filters and Bottled Water

Filtered WaterD. D. Derashri, Secretary, PANIWALE-NGO

Now a days, it is a fashion to install R.O. (reverse osmosis) technology water purifiers at homes, offices and other workplaces and the use of cane water, said to be purified by R.O. process, is also increasing for marriage and other parties. But with this technology involving reduction in TDS (Total Dissolved Solids), some minerals useful for our health are also lost and the use of plastic in the process of purification and storage is also not safe. Consuming over purified water also reduces our immunity. So a critical review is required before adopting this system. You may read full article below.

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दुबई में लग रहे नीम और बड़, हम लगा रहे खजूर

 

दुबई में सड़क के किनारे लगे पीपल के पेड़

दुबई में  नीम, पीपल और बरगद जैसे वृक्ष लगाने को प्राथमिकता दी जा रही है जबकि यहाँ भारत में हम आधुनिकता या फैशन के नाम पर खजूर के वृक्ष लगाने लगे हैं। नीम, पीपल और बरगद जैसे वृक्ष घने पत्तों वाले होते हैं और समय के साथ फैलते जाते हैं और इनसे भरपूर वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration) होता है जबकि खजूर के पत्तों की संख्या सीमित होती है और समय के साथ बढ़ती नहीं है जिससे वाष्पोत्सर्जन सीमित ही रहता है। हरियाली बढ़ने से हवा में नमी बढ़ती है और न्यूनतम व अधिकतम तापमान में अंतर घटता है जो जीवनयापन को सुखद बनाने में सहयोगी होता है। पूरा लेख आगे पढ़िये। Continue reading

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कुछ देर नंगे पाँव चलें – स्वस्थ रहें

नंगे पैरजो लोग अधिक स्वस्थ, युवा और ओजस्वी दिखने की प्रबल इच्छा रखते हैं उन्हें प्रतिदिन कम से कम दस मिनट नंगे पाँव हरी घास या बालू पर चलना चाहिये । ऐसा करने से स्वास्थ्य संबंधी कई लाभ होते हैं जिसमें रोग प्रतिरोध क्षमता में वृद्धि और हृदयरोग के आसार में कमी भी सम्मिलित है ।

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TIMELY MAINTENANCE – KEY TO AVOID FAILURES OF STRUCTURES

D. D. Derashri *

Here is an article on failures of structures written by an Engineer, having vast knowledge of his subject and long field experience – why they happen, what are the implications and how they can be reduced. The key solution suggested by the author is timely maintenance.

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आवश्यक है विकास कार्यों में लागत नियंत्रण और घोषित लाभों के लिये सजगता

development 3सामान्यतः विकास कार्यों के प्रस्ताव किसी जन समस्या के निदान के लिये बनाए जाते हैं और इनका उद्देश्य प्रासंगिक समस्या का निदान करना होता है। देखा यह जा रहा है कि विकास कार्यों के प्रस्ताव बनाते समय लागत नियंत्रण पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता बल्कि अधिक से अधिक लागत को ही समस्या के निदान का मापदंड मान लिया जाता है। इसी प्रकार योजना पूरी होने पर उसका रखरखाव कम से कम लागत में हो और योजना चिरायु हो कर लंबे समय तक अपेक्षित परिणाम देती रहे इसका भी ध्यान नहीं रखा जाता। फलस्वरूप ऐसी योजनाओं के पूरा होने के कुछ ही समय बाद हम देखते हैं कि भारी भरकम खर्च के बाद भी योजना अपने अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है और जन समस्या ज्यों कि त्यों है या और गंभीर हो गई है। सामान्यतः योजना के प्रारंभ होने और पूरी होने के बीच संबंधित अधिकारी बदल जाते हैं और जबाबदेही का निर्धारण नहीं होता है। जनता की याददाश्त भी कमज़ोर होती है और मीडिया में नए नए प्रकरण आ जाने से पुराने प्रकरण धूमिल होते जाते हैं। बदली परिस्थिति में कुछ अर्से बाद इसी समस्या के लिये हम एक और योजना का नाम सुनते हैं जिसकी लागत और भी अधिक होती है। इस बीच जन प्रतिनिधि और नीति निर्माता भी बदल जाते हैं और मूल पुरानी समस्या को नई समस्या मानते हुए इसके निदान के लिये नई योजना को मंजूर कराने का दबाव बनाया जाता है। लेकिन समस्या और विकराल रूप ले लेती हैं और जनता त्रस्त ही रहती है।

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हिंदी को भाषा के बजाय एक बोली बनाने का कुप्रयास

हिंदी दिवस 2012 पर विशेष

-ज्ञान प्रकाश सोनी

logo for hindi day14 सितंबर 1947 को स्वाधीन भारत की संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी । इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी दिवस मनाते तो हमें कई साल हो गये लेकिन आज स्थिति यह है कि हिंदी बोलते समय कोई उसमें आधी अंग्रेज़ी न घुसाएं तो उसे यह डर रहता है कि कहीं उसे अनपढ़ या पिछड़ा न मान लिया जावे। जो शब्द हिंदी में नहीं हैं, जैसे मोबाइल, कम्प्यूटर, सोनोग्राफ़ी आदि को, यों का यों अंग्रेज़ी में लिखना तो समझ में आता है लेकिन वारों को रविवार, सोमवार के बजाय संडे, मंडे, संख्याओं को एक, दो के बजाय वन, टू, रंगों को नीले, पीले के बजाय ब्ल्यू, यैलो, शरीर के अंगों को आँख, कान के बजाय आइज़, ईअर, फलों को संतरा, नींबू के बजाय औरेंज, लैमन, जानवरों के नामों को कुत्ता, बिल्ली के बजाय डॉग, कैट आदि बोलना तो सामान्य सा है, चूड़ियों को बैंगल और महिलाओं को विमन बोलना भी सामान्य सा हो चला है। यह परिपाटी हिंदी को भाषा के बजाय एक बोली का रूप दे देगी जो बहुत घातक सिद्ध होगा। पूरा लेख आगे पढ़िये।

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भारत में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ती खाई

भारतीय मुद्रा

किसी भी राष्ट्र की स्थिरता, प्रभुसत्ता, चिरायु प्रगति, आपसी सद्भावना आदि के लिये यह आवश्यक है कि वहाँ के नागरिकों के अमीर और गरीब तबके के आर्थिक आधार में फ़र्क कम हो। अमीर और गरीब तबके के बीच अंतर सभी देशों में है लेकिन भारत में यह कुछ ज़्यादा ही है जो साल दर साल और बढ़ता जा रहा है। विगत वर्ष देश के पच्चीस प्रमुख कंपनी प्रबंधकों ने 67.20 करोड़ रूपये से 1.90 करोड़ रूपये सालाना का पारिश्रमिक प्राप्त किया जबकि महामहिम राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री व सेना प्रमुख महोदयों का सालाना वेतन क्रमशः 18.00, 16.20 व 10.80 लाख रूपये वार्षिक है। यहाँ उल्लेखनीय यह है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार भारत की कुल आबादी के 10% नागरिक 16 रूपये प्रतिदिन यानि 5840 रूपये वार्षिक पर गुज़ारा करने को मजबूर हैं। विश्व बैंक के एक अनुमान के अनुसार भारत की 32.7% आबादी लगभग 65 रूपये प्रतिदिन (1.25 डॉलर प्रतिदिन) पर अपना गुज़र करती है। इसी क्रम में यह भी उल्लेखनीय है कि योजना आयोग द्वारा प्रकाशित मानव विकास प्रतिवेदन (Human Development Report) के अनुसार देश की 38% संपत्ति 5% उच्च तबके के आधिपत्य में है और मात्र 13% संपत्ति 60% निचले तबके के पास है। अतः समय रहते हमें गंभीरता से अमीर और गरीब के बीच की बढ़ती खाई को का करने की नीति अपनानी होगी नहीं तो इस कथित आर्थिक विकास का कोई लाभ देश को नहीं मिल सकेगा। संबंधित विस्तृत आंकड़े, विवरण व संदर्भ आगे देखें। Continue reading

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मँहगाई की मार से दम तोड़ता न्यायालय की अवमानना का कानून

icon courtभारत में मँहगाई लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन अधिकतर कानूनों में जिन ज़ुर्मानों का प्रावधान है वे जिस साल बने थे तब से वहाँ के वहाँ ही हैं और इस कारण कई कानून लगभग प्रभावहीन होते जा रहे हैं – उदाहरण के लिये न्यायालय की अवमानना के कानून को लें तो इसमें न्यायालय के आदेशों की अवमानना सिद्ध होने पर 2000 रूपयों तक के ज़ुर्माने या छः माह तक की जेल या दोनों के दंड का प्रावधान है और अदालत ठीक समझे तो केवल क्षमायाचना पर संबंधित आरोपी को दोषमुक्त भी कर सकती है। जेल की सज़ा के लिये तो पुख़्ता सबूत और गंभीर अवमानना निर्विवाद रूप से साबित होना आवश्यक है जो अपवाद स्वरूप ही होता है बाकी मामलों में ज़ुर्माना ही लगाया जा सकता है जो आज की परिस्थितियों में इतना कम है कि लोगों का अवमानना कानून से डर ही खत्म हो गया है और आये दिन हम “स्टे के बावज़ूद निर्माण”, “न्यायिक आदेशों की धज्जियाँ उड़ी” जैसे शीर्षकों की ख़बरें पढ़ते रहते हैं। इसलिये यह आवश्यक हो गया है कि न केवल अवमानना कानून, बल्कि सभी कानून, जिनमें ज़ुर्माने का प्रावधान है उनका पुनरावलोकन कर आज की परिस्थितियों के अनुसार संशोधन किया जावे। पूरा लेख आगे पढ़िये।

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