हिंदी को भाषा के बजाय एक बोली बनाने का कुप्रयास

हिंदी दिवस 2012 पर विशेष

-ज्ञान प्रकाश सोनी

logo for hindi day14 सितंबर 1947 को स्वाधीन भारत की संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी । इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिंदी दिवस मनाते तो हमें कई साल हो गये लेकिन आज स्थिति यह है कि हिंदी बोलते समय कोई उसमें आधी अंग्रेज़ी न घुसाएं तो उसे यह डर रहता है कि कहीं उसे अनपढ़ या पिछड़ा न मान लिया जावे। जो शब्द हिंदी में नहीं हैं, जैसे मोबाइल, कम्प्यूटर, सोनोग्राफ़ी आदि को, यों का यों अंग्रेज़ी में लिखना तो समझ में आता है लेकिन वारों को रविवार, सोमवार के बजाय संडे, मंडे, संख्याओं को एक, दो के बजाय वन, टू, रंगों को नीले, पीले के बजाय ब्ल्यू, यैलो, शरीर के अंगों को आँख, कान के बजाय आइज़, ईअर, फलों को संतरा, नींबू के बजाय औरेंज, लैमन, जानवरों के नामों को कुत्ता, बिल्ली के बजाय डॉग, कैट आदि बोलना तो सामान्य सा है, चूड़ियों को बैंगल और महिलाओं को विमन बोलना भी सामान्य सा हो चला है। यह परिपाटी हिंदी को भाषा के बजाय एक बोली का रूप दे देगी जो बहुत घातक सिद्ध होगा। पूरा लेख आगे पढ़िये।

स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा मानने का निर्णय लिया गया था जो भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में इस प्रकार वर्णित है:

संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितम्बर, 1949 के दिन बहस में भाग लेते हुए तीन प्रमुख बातें कही थीं —

1. किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता।

2. कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती।

3. भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिन्दी को अपनाना चाहिए।

यह बहस 12 सितम्बर, 1949 को 4 बजे दोपहर में शुरू हुई और 14 सितंबर, 1949 के दिन समाप्त हुई। 14 सितम्बर, की शाम बहस के समापन के बाद भाषा संबंधी संविधान का तत्कालीन भाग 14 क और वर्तमान भाग 17, संविधान का भाग बन गया। संविधान – सभा की भाषा – विषयक बहस लगभग 278 पृष्ठों में मुद्रित हुई । इसमें डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और श्री गोपाल स्वामी आयंगार की महती भूमिका रही। संविधान की धारा 344(2) व धारा 351 के निर्देशों के अनुसार 1965 तक (यानि संविधान लागू होने के 15 साल बाद हिंदी केन्द्रीय सरकार की एकमात्र अधिकृत भाषा बन जायगी यह परिकल्पना थी लेकिन दक्षिण भारत में हुए हिंदी विरोधी आंदोलनों के फलस्वरूप 1963 में संविधान में यह संशोधन किया गया कि अंग्रेज़ी अनिश्चितकाल तक भारत की अधिकृत भाषा बनी रहेगी लेकिन संविधान का यह प्रावधान यथावत रखा गया कि केन्द्र सरकार हिंदी के प्रचार प्रसार के लिये प्रयासरत रहगी।

महात्मा गांधी के सपनों के भारत में एक सपना राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को प्रतिष्ठित करने का भी था। उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना कोई भी राष्ट्र गूँगा हो जाता है।

नागपुर में आयोजित प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया गया था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए तथा एक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना की जाय, जिसका मुख्यालय वर्धा में हो। अगस्त, 1976 में मॉरीशस में आयोजित द्वितीय विश्व हिन्दी सम्मेलन में यह तय किया गया कि मॉरीशस में एक विश्व हिन्दी केंद्र की स्थापना की जाए जो सारे विश्व में हिन्दी की गतिविधियों का समन्वय कर सके। चतुर्थ विश्व हिन्दी सम्मेलन के बाद ‘विश्व हिन्दी सचिवालय’ की स्थापना मॉरीशस में हुई और भारत में एक ‘अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय’ की स्थापना को मूर्त रूप देने की आवश्यकता समझी गयी। यह संभव हुआ वर्ष 1997 में, जब भारत की संसद द्वारा एक अधिनियम पारित करके महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की स्थापना राष्ट्रपिता की कर्मभूमि वर्धा में की गयी। इस विश्वविद्यालय की स्थापना से भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र की एक लालसा भी पूरी हुई जो मृत्युपर्यन्त उनके मन-मस्तिष्क में छायी रही थी। वह लालसा थी ‘अपने उद्योग से एक शुद्ध हिन्दी की यूनिवर्सिटी स्थापित करना’।

आज कई विदेशी छात्र हमारे देश में हिंदी और संस्कृत भाषाएँ सीखने आ रहे हैं। विदेशी छात्रों के इस झुकाव की वजह से देश के कई विश्वविद्यालय इन छात्रों को हमारे देश की संस्कृति और भाषा के ज्ञानार्जन के लिए सुविधाएँ प्राप्त करवा रहे हैं। विदेशों में हिंदी भाषा की लोकप्रियता यहीं खत्म नहीं होती। विश्व का पहला हिंदी सम्मेलन नागपुर में सन् 1975 में हुआ था। इसके बाद ऐसे सम्मेलन विश्व में बहुत से स्थानों पर आयोजित हो चुके हैं। दूसरा सम्मेलन मॉरीशस में सन् 1976 में, तीसरा भारत में सन् 1983 में, चौथा पुनः मॉरिशस में सन् 1993 में, पाँचवाँ ट्रिनिडाड और टोबैगो में सन् 1996 में, छठा इंगलैंड में 1999 में, सातवाँ सूरीनाम में 2003 में, आठवाँ अमेरिका में सन् 2007 में और नौंवा विश्व हिंदी सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सिबर्ग में 22-24 सितंबर 2012 के मध्य आयोजित होने वाला है जिसका मुख्य विषय-भाषा की अस्मिता और हिंदी का वैश्विक सन्दर्भ है.

एक तरफ़ यह सब है तो दूसरी तरफ़ हालत यह है कि अच्छे भले प्रचलित शब्दों को त्याग कर हम संख्याओं, वारों, रंगों, शरीर केअंगों, फलों, जानवरों, आदि के अंग्रेज़ी रूप काम में लेने में अपनी वाहवाही समझते हैं। किसी भाषा में संज्ञाओं (nouns) की कमी हो सकती है लेकिन क्रियाओं (verbs) की कमी नहीं हो सकती। लेकिन वास्तविकता यह है कि हिंदी बोलते समय हम न केवल संज्ञाओं का अंग्रेज़ीकरण कर रहे हैं, हिंदी क्रिया शब्दों के बजाय भी उनके अंग्रेज़ी रूप काम में लेने लगे हैं जैसे तथा या और के बजाय एंड (and), लेकिन के बजाय बट (but), यदि के बजाय इफ़ (if), आदि । संचार माध्यम काम लें के बजाय यूज़ में लें, मनाएं के बजाय सेलिब्रेट करें, खरीदें के बजाय बाय करें और बेचें के बजाय सैल करें बोलने लगे हैं। जन्म दिवस अब बर्थ डे हो चुका है, जूते शूज़ और मोज़े सोक्स हो गये हैं। बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम से सही अंग्रेज़ी सीख पाएं या नहीं, लेकिन उनकी माँओं और दादियों को घरेलू चीज़ों के ये नए नाम सीखने पड़ रहे हैं।

हिंदी वर्तनी पर ध्यान दिया जाना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं माना जाता और खुलेआम यह कहा जाता है कि छोटी मोटी ग़लतियाँ तो चलती हैं। निजी स्तर की तो छोड़ें, सरकारी स्तर पर भी गंभीर त्रुटियाँ रह जाना सामान्य सा है। पहले समाचार पत्रों को भाषा सीखने का अच्छा माध्यम माना जाता था और अध्यापक हिंदी अँग्रेज़ी सुधारने के लिये समाचार पत्र पढ़ने की सलाह दिया करते थे लेकिन आज की स्थिति उल्टी है क्योंकि समाचार पत्रों में ढेरों ग़लतियाँ देखने में आती हैं। कई पुस्तकों का भी यही हाल है।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि किसी भी भाषा के विकास के निम्नलिखित तीन सोपान (stages) होते हैं –

प्रथम सोपान- ‘बोली’

पहले स्तर पर भाषा का मूल रूप एक सीमित क्षेत्र में आपसी बोलचाल के रूप में प्रयुक्त होने वाली बोली का होता है, जिसे स्थानीय, आंचलिक अथवा क्षेत्रीय बोली कहा जा सकता है। इसका शब्द भंडार सीमित होता है। कोई नियमित व्याकरण नहीं होता। इसे शिक्षा, आधिकारिक कार्य–व्यवहार अथवा साहित्य का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

द्वितीय सोपान- ‘भाषा’

वही बोली कुछ भौगोलिक, सामाजिक–सांस्कृतिक, राजनीतिक व प्रशासनिक कारणों से अपना क्षेत्र विस्तार कर लेती है, उसका लिखित रूप विकसित होने लगता है और इसी कारण से वह व्याकरणिक साँचे में ढलने लगती है, उसका पत्राचार, शिक्षा, व्यापार, प्रशासन आदि में प्रयोग होने लगता है, तब वह बोली न रहकर ‘भाषा’ की संज्ञा प्राप्त कर लेती है।

तृतीय सोपान- ‘मानक भाषा’

यह वह स्तर है जब भाषा के प्रयोग का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो जाता है। वह एक आदर्श रूप ग्रहण कर लेती है। उसका परिनिष्ठित रूप होता है। उसकी अपनी शैक्षणिक, वाणिज्यिक, साहित्यिक, शास्त्रीय, तकनीकी एवं क़ानूनी शब्दावली होती है। इसी स्थिति में पहुँचकर भाषा ‘मानक भाषा’ बन जाती है। उसी को ‘शुद्ध’, ‘उच्च–स्तरीय’, ‘परिमार्जित’ आदि भी कहा जाता है।

उपरोक्त आधार पर हिंदी में अंग्रेज़ी घुसाने और वर्तनी संबेधित गंभीर त्रुटियों को नज़रअंदाज़ करने की यह स्थिति शर्मनाक, घातक और त्याज्य है क्योंकि इससे हिंदी जो वर्तमान में एक भाषा है, और उन्नत हो कर परिमार्जित भाषा बनने के बजाय अवनत हो कर एक बोली’ का स्वरूप ले लेगी। अख़बार, टीवी, सिनेमा जैसे संचार माध्यम इस स्थिति को सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान कर सकते हैं लेकिन विडम्बना यह है कि संचार माध्यम ही यह सब कबाड़ा करने पर तुले हुए हैं।

हिंदी भाषा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य :

2001 की जनसंख्या के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 102.7 करोड़ थी जिसमें से लगभग 42 करोड़ लोग (लगभग 41%) हिंदी बोलने वाले थे। सन् 2011 में कुल जनसंख्या 121 करोड़ हो गई है जिसमें भाषावार आँकड़े अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं। यदि पूर्व प्रतिशत ही मानें तो 2011 में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या लगभग 50 करोड़ अनुमानित है। विभिन्न भाषाओं को बोलने वालों का विस्तृत विवरण जानने के लिये देखें www.shikshanjali.org – भारत में हिंदी और अन्य भाषाएं जानने वालों की संख्या

हिंदी और अंग्रेज़ी की खिचड़ी का प्रचलन दिनों दिन बढ़ रहा है। श्री राजीव गाँधी चुनावों के दौरान एक बार ऐसी ही खिचड़ी भाषा का प्रयोग कर भूलवश बोल गए थे कि – हम ये इलेक्शन जीतें या लूसें ("Hum yeh election chahein jeetein ya loosein…")

हिंदी भाषा के इतिहास पर पहले साहित्य की रचना भी ग्रासिन द तैसी, एक फ्रांसीसी लेखक ने की थी।

हिंदी और दूसरी भाषाओं पर पहला विस्तृत सर्वेक्षण सर जॉर्ज अब्राहम ग्रीयर्सन (जो कि एक अँग्रेज़ हैं) ने किया।

हिंदी भाषा पर पहला शोध कार्य ‘द थिओलॉजी ऑफ तुलसीदास’ को लंदन विश्वविद्यालय में पहली बार एक अग्रेज़ विद्वान जे.आर.कार्पेंटर ने प्रस्तुत किया था।

संदर्भ –

//hindiurduflagship.org/

//hindiusa.org/index.php?option=com_newsfeeds&view=categories&Itemid=49

//en.wikipedia.org/wiki/Demographics_of_India

//en.wikipedia.org/wiki/Hindi

//en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_English-speaking_population

Seema Chishti (Apr 17 2007). "Growing up with Rahul Gandhi". The Indian Express. //www.indianexpress.com/news/growing-up-with-rahul-gandhi/28583/0

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